समावेशी विद्यालय का निर्माण (Creating an Inclusive School )

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 समावेशी विद्यालय का निर्माण (Creating an Inclusive School )

समावेशी विद्यालय की संकल्पना एक ऐसी शैक्षिक व्यवस्था की ओर संकेत करती है जहाँ समाज के हर वर्ग के बच्चों को, चाहे वे किसी भी प्रकार की भिन्नता से जुड़े हों – जैसे शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भाषाई, सांस्कृतिक, सामाजिक या आर्थिक – समान शिक्षा का अधिकार एवं अवसर प्रदान किया जाता है। यह शिक्षा प्रणाली ‘समानता, न्याय और सहभागिता’ के सिद्धांतों पर आधारित है, जो यह मानती है कि प्रत्येक बच्चा विशेष है और उसे सम्मान के साथ अपनी क्षमताओं के अनुसार सीखने का अवसर मिलना चाहिए।

समावेशी विद्यालय का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा केवल इस आधार पर शिक्षा से वंचित न हो कि उसमें कोई कमी या भिन्नता है। यह विचारधारा यह भी मानती है कि शिक्षा सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज में रहने, एक-दूसरे को समझने, सहनशीलता, समानता और मानवता को अपनाने की प्रक्रिया है। समावेशी शिक्षा का महत्व इसलिए और भी बढ़ जाता है क्योंकि यह सभी छात्रों को एक साझा कक्षा, साझा शिक्षक और साझा संसाधनों के माध्यम से सीखने का अवसर देती है।

समावेशी विद्यालय की सफलता के लिए सबसे पहले विद्यालय के वातावरण को सकारात्मक और सहयोगात्मक बनाना आवश्यक है। शिक्षक को विद्यार्थियों की विविध आवश्यकताओं को समझने, उन्हें स्वीकार करने और उन पर संवेदनशील रूप से प्रतिक्रिया देने की आवश्यकता होती है। ऐसे विद्यालय में शिक्षकों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे विभिन्न प्रकार की विशेष आवश्यकताओं वाले बच्चों जैसे दिव्यांग, दृष्टिबाधित, श्रवणबाधित, मंदबुद्धि, सीखने में धीमे या सामाजिक रूप से पिछड़े बच्चों के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार कर सकें। साथ ही विद्यालयों में शारीरिक पहुँच (रैंप, लिफ्ट, ब्रेल, सुनने वाले उपकरण), पाठ्यपुस्तकों का सरलीकरण, तकनीकी संसाधनों का उपयोग और अनुकूल मूल्यांकन प्रणाली जैसी सुविधाएँ भी प्रदान की जाती हैं।

समावेशी विद्यालयों में केवल विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को ही लाभ नहीं मिलता, बल्कि सामान्य बच्चों के अंदर भी करुणा, सहिष्णुता, नेतृत्व, सहयोग, और सामूहिकता जैसे मानवीय गुणों का विकास होता है। यह शिक्षा का ऐसा वातावरण बनाता है जो बच्चों को वास्तविक जीवन की विविधताओं से परिचित कराता है और उन्हें एक उत्तरदायी नागरिक बनने की दिशा में प्रेरित करता है।

आज भारत में समावेशी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए निःशक्तजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act), 2016, समग्र शिक्षा अभियान, NCF 2005, नई शिक्षा नीति 2020 जैसे कई प्रयास किए गए हैं। इन नीतियों का मुख्य उद्देश्य शिक्षा को सभी के लिए समान, सुलभ और समावेशी बनाना है।

 निष्कर्ष:-

समावेशी विद्यालय एक ऐसी सोच है जो केवल शिक्षण पद्धति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक परिवर्तन और समानता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह हमें यह सिखाता है कि हर बच्चा, चाहे वह किसी भी स्थिति में हो, समाज और शिक्षा में बराबरी से भाग लेने का हकदार है। जब हम शिक्षा को समावेशी बनाते हैं, तब हम केवल ज्ञान नहीं बाँटते, बल्कि समावेश, करुणा और सहयोग जैसे मूल्यों को भी विकसित करते हैं, जो एक सशक्त, संवेदनशील और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण की नींव हैं।

 

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